नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिन पर उनकी सुनी अनसुनी यादों को जाने 

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिन पर उनकी सुनी अनसुनी यादों को जाने 

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिन पर सुनी अनसुनी यादें - समस्त भारतीय के दिलो में नेता जी के नाम से राज करने वाले सुभाष चंद्र बोस (23 जनवरी, 1897 -18 अगस्त, 1945), जिन्हें 'नेताजी' के नाम से जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। उनका जन्म कटक, ओडिशा में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उन्होंने 1920 में इंग्लैंड में भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन ब्रिटिश शासन की सेवा करने के बजाय उन्होंने इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। 

वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और 1938 (हरिपुरा) और 1939 (त्रिपुरी) में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। गांधीजी के साथ वैचारिक मतभेदों के कारण, उन्होंने 1939 में कांग्रेस छोड़ दी और 'फॉरवर्ड ब्लॉक' नामक अपनी पार्टी बनाई।  द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, वे विदेश गए (जर्मनी और फिर जापान) ताकि अंग्रेजों के खिलाफ सैन्य सहायता प्राप्त की जा सके।उन्होंने सिंगापुर में 'आजाद हिंद फौज' (Indian National Army) का पुनर्गठन किया और "दिल्ली चलो" का नारा दिया। "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" का प्रसिद्ध आह्वान उन्हीं की जुबानी है।

 

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से सहायता लेने का प्रयास किया था, तो ब्रिटिश सरकार ने अपने गुप्तचरों को 1941 में उन्हें खत्म करने का आदेश दिया था। नेता जी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' (सर्वोच्च सेनापति) के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा, इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

21अक्टूबर 1943 को बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फ़िलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशो की सरकारों ने मान्यता दी थी। जिसमें जापान ने अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह को अस्थायी सरकार को दे दिए। सुभाष उन द्वीपों में गए और उनका नया नामकरण किया।

1944 में आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ। 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी किया जिसमें उन्होंने इस निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उनका आशीर्वाद और शुभ कामनाएँ मांगी।

इस महान व्यक्तित्व के धनी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है। जापान में प्रतिवर्ष 18 अगस्त को उनका शहीद दिवस मनाया जाता है परन्तु भारत में रहने वाले उनके परिवार के लोगों का आज भी यह मानना है कि सुभाष की मौत 1945 में नहीं हुई। वे उसके बाद रूस में नज़रबन्द थे। यदि ऐसा नहीं है तो भारत सरकार ने उनकी मृत्यु से संबंधित दस्तावेज अब तक सार्वजनिक नहीं किए क्योंकि नेता जी की मृत्यु नहीं हुई थी। 16 जनवरी 2014 को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नेता जी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए विशेष पीठ के गठन का आदेश दिया।

आज़ाद हिन्द सरकार के 75 वर्ष पूर्ण होने पर इतिहास में पहली बार वर्ष 2018 में भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने लाल क़िला पर तिरंगा फहराया। 23 जनवरी 2021 को नेताजी की 125वीं जयंती थी जिसे भारत सरकार के निर्णय के तहत पराक्रम दिवस के रूप में मनाया गया। 8 सितम्बर 2022 को नई दिल्ली में राजपथ, जिसका नामकरण कर्तव्यपथ किया गया है , जहां पर नेताजी की विशाल प्रतिमा का अनावरण किया गया।

बात सन् 1934 की है जब जब सुभाष जी ऑस्ट्रिया में अपना इलाज कराने के लिए ठहरे हुए थे उस समय उन्हें अपनी पुस्तक लिखने के लिए एक अंग्रेजी जानने वाले टाइपिस्ट की आवश्यकता हुई। उनके एक मित्र ने एमिली शेंकल नाम की एक ऑस्ट्रियन महिला से उनकी मुलाकात करा दी। एमिली के पिता एक प्रसिद्ध पशु चिकित्सक थे। सुभाष एमिली की ओर आकर्षित हुए और उन दोनों में स्वाभाविक प्रेम हो गया। नाजी जर्मनी के सख्त कानूनों को देखते हुए उन दोनों ने सन् 1942 में बाड गास्टिन नामक स्थान पर हिन्दू पद्धति से विवाह रचा लिया। वियेना में एमिली ने एक पुत्री को जन्म दिया। सुभाष ने उसे पहली बार तब देखा जब वह मुश्किल से चार सप्ताह की थी। उन्होंने उसका नाम अनिता बोस रखा था। अगस्त 1945 में ताइवान में हुई तथाकथित विमान दुर्घटना में जब सुभाष की मौत हुई, अनिता पौने तीन साल की थी।अनिता अभी जीवित है। उसका नाम अनिता बोस फाफ है। अपने पिता के परिवार जनों से मिलने अनिता फाफ कभी-कभी भारत भी आती है।