सोते समाज के लिए बाबा साहेब ने जागकर लिखा संविधान - डॉ सुनील कुमार 

सोते समाज के लिए बाबा साहेब ने जागकर लिखा संविधान - डॉ सुनील कुमार 

बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती पर विशेष

इस तरह हौसले आजमाया करो।

मुश्किले देखकर मुस्कराया करो।

दो निवाले भले ही कम खाया करो

लेकिन अपने बच्चों को पढ़ाया करो।

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का देश की 90 फीसदी आबादी के लिए यहीं संदेश था। वह चाहते थे कि हर युग में कोई न कोई रहनुमा शोषितों का रहना चाहिए। वह जानते थे कि रहनुमाई राजनीति से ही मिलेगी, इसीलिए उन्होंने हवाई चप्पल पहनने वाले से लेकर हवाई जहाज में चलने वालों तक के लिए संविधान में वोट का अधिकार बराबर रखा। साथ ही सत्ता में भागीदारी के लिए भी दलितों के लिए सुरक्षित सीट की व्यवस्था कायम की। उनका मानना था कि जब राजनीति से हर चीज तय होती है तो आपको भी आने वाले समय में अपनी राजनीति तय करनी पड़ेगी। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में बाबा साहब की प्रासंगिकता एक उज्ज्वल दीपक की भांति चमक रही है, जहाँ दलित वोट बैंक की होड़ में सभी दल उनके नाम को तिरस्कार नहीं कर पा रहे। अप्रैल में, जब उत्तर प्रदेश चुनावी बिगुल बजने को तैयार है, अंबेडकर जयंती राजनीतिक दलों के लिए सामरिक महत्व की घटना बन चुकी है। चुनौती पहले भी थी और आगे भी रहेगी, जब तक आरक्षण और असमानता की खाई को ईमानदारी के साथ पाटा नहीं गया। बाबा साहेब के दौर में भी उनके समकालिक नेता नेहरू, पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, जयप्रकाश नारायण ने जब मजाक में कहा कि बाबा साहेब आपकी डिबरी रातभर जलती है और आप रातभर डिबरी के सामने बैठे रहते हो। कब सोते हो। तब बाबा साहेब ने कहा कि आप का समाज जाग रहा है इसलिए आप सो रहे हो। मेरा समाज सोया है इसलिए मुझे रातभर जागकर संविधान में उनके लिए क्या किया जा सकता है? सोचता हूं। आज हम बाबा साहेब के प्रति श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके सिर्फ कोटेशन का पालन करने की अपील सभी वर्गों से कर रहे हैं। मेरा मानना है कि ... कुछ बात है कि हस्ती उनकी मिटती नहीं। बाबा साहेब के विचार अपने ही देश में नहीं विदेशों में भी लोग अपना रहे हैं। कैंब्रिज, लंदन, अमेरिका में उनकी बूत लगी हुई है।

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर, जिन्हें बाबा साहब के नाम से जाना जाता है, भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार थे, जिन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध जीवनभर संघर्ष किया। उनके विचार सामाजिक न्याय, समता और बंधुत्व के स्तंभ हैं, जो आज भी भारतीय लोकतंत्र की आत्मा बने हुए हैं। महू में 14 अप्रैल 1891 को जन्मे इस महान पुरुष ने दलितों, महिलाओं और वंचितों के अधिकारों की रक्षा हेतु संविधान में अनेक प्रावधान कराए। उनका जीवन अन्याय के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक है। जातिवाद की जंजीरों को तोड़ते हुए उन्होंने शिक्षा को मुक्ति का साधन बनाया। आज जब विश्व नवीन चुनौतियों से जूझ रहा है, बाबा साहब का संदेश एक उपदेश की भांति गूंजता है – "जीवन लंबा होने की बजाय महान होना चाहिए। 

2026 का भारत वैश्विक उथल-पुथल से गुजर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से भारत के निर्यात पर दबाव पड़ रहा है, टैरिफ बढ़कर 25% से 50% हो गए हैं, जिससे आर्थिक असमानता गहरा रही है। ऐसे में बाबा साहब के सामाजिक न्याय के सिद्धांत आर्थिक समावेशिता का आधार बनते हैं। मध्य प्रदेश में 8 से 14 अप्रैल तक उनके विचारों पर आधारित कार्यक्रम हो रहे हैं, सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने हेतु। 

ट्रंप की 'लिबरेशन डे' नीति ने भारत-अमेरिका व्यापार को प्रभावित किया है, जहाँ USAID परियोजनाएँ अनिश्चित हैं। बाबा साहब का कोट– "समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन इसे गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा" – आज वैश्विक व्यापार में समान अवसरों की मांग करता है। यह परिवेश बाबा साहब के लोकतांत्रिक चिंतन को पुनर्जीवित करता है।

वर्तमान राजनीति में उपयोगिता एवं विश्लेषण

सभी राजनीतिक दल बाबा साहब को याद कर रहे हैं क्योंकि दलित वोट बैंक (लगभग 23 % उत्तर प्रदेश में) चुनावी कुंजी है। भाजपा ने अंबेडकर मूर्ति विकास योजना मंजूर की, 2027 चुनाव हेतु दलित आउटरीच मजबूत करने को। बसपा लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन करेगी, मायावती और आकाश आनंद के नेतृत्व में। 

समाजवादी पार्टी गांव-गांव जयंती मनाएगी, संविधान बचाओ अभियान चला रही है। कांग्रेस 75 जिलों में आयोजन करेगी। प्रोफेसर बद्री नारायण के अनुसार, हर दल को अंबेडकर की जरूरत है क्योंकि वे सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं। यह 'रणनीतिक स्मृति' है – सम्मान कम, वोट अधिक। उत्तर प्रदेश में जाटव (बसपा कोर) vs गैर-जाटव (भाजपा लक्ष्य) की होड़ में अंबेडकर नाम हथियार बन गया। 

ट्रंप युग में भारत की विदेश नीति मजबूत हो रही है, लेकिन आंतरिक असमानता बाबा साहब के "राजनीतिक लोकतंत्र के साथ सामाजिक लोकतंत्र आवश्यक" संदेश की याद दिलाती है। 

बाबा साहब के कोट साहित्यिक रत्न हैं। "मैं ऐसे धर्म को मानता हूं, जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए।" – आज धार्मिक ध्रुवीकरण के दौर में यह एकता का आह्वान है। 

"भाग्य में विश्वास रखने के बजाय अपनी शक्ति और कर्म में विश्वास रखना चाहिए।" – ट्रंप टैरिफ के विरुद्ध भारत के निर्यातक कर्मठता से प्रेरित हो सकते हैं। "जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है, वो आपके किसी काम की नहीं।" – दलित आरक्षण बहस में प्रासंगिक। 

"यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मों के शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए।" – सांप्रदायिक सद्भाव हेतु। "जीवन लंबा होने की बजाय महान होना चाहिए।" – नेताओं को निस्वार्थ सेवा सिखाता है। 

ये कोट आज अलंकारिक भाषा में कहें तो 'समुद्र की गहराई' समान हैं, जो राजनीतिक तूफानों में दिशा दिखाते हैं।

राजनीतिक दलों की अंबेडकर-भक्ति वोट-केंद्रित है। उदाहरणस्वरूप, भाजपा की मूर्ति योजना गैर-जाटव दलितों को लुभाने की चाल है, जबकि बसपा का लखनऊ आयोजन जाटव एकजुटता का। सपा का गांव-स्तरीय अभियान पिछड़े वोट जोड़ता है। ट्रंप की नीतियों से प्रभावित किसानों/मजदूरों के संदर्भ में बाबा साहब का "इतिहास बताता है कि जहां नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच संघर्ष होता है, वहां जीत हमेशा अर्थशास्त्र की होती है" चेतावनी देता है। 

 यह स्मृति सकारात्मक है यदि विचारों पर अमल हो, अन्यथा छल मात्र। बाबा साहब कहते हैं, "बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए" – दलों को बौद्धिक ईमानदारी अपनानी चाहिए। 

कहने का आशय यह है कि बाबा साहब का संदेश सूर्य की किरणों सा अटल है। 14 अप्रैल 2026 को जयंती मात्र नहीं, सामाजिक क्रांति का संकल्प हो। सभी दलों को उनके कोट अपनाने होंगे – "हम सबसे पहले और अंत में भी भारतीय हैं। तब ही ट्रंप-युगीन चुनौतियों में भारत समृद्ध होगा।

डॉ. सुनील कुमार 

असिस्टेंट प्रोफेसर जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग,

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर।