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आज के ग्यारवे अंक मे महामारी या बहार पढ़े कवि रघुबंशमणि दूबे की रचना

त्राहि-त्राहि मचा विश्वमय , इस संकटकाल से उबरे कैसे ।
ओलें जस यह पड़ी धरा पर , व्यापे उन्हें जो घर से निकसे ।।
चारो ओर मचा कोहराम , शान्त पवन की धार है ।
महामारी तो है यह फिर भी , प्रदूषण मुक्त्त बहार है ।।

दुबक पड़े जन-जन निज आलय , सकल जहान निज जान है ।
अपनो के बीच समय इतना , कब किसका कितना दान है ।।
धरती स्वच्छ पवन पुरवइया , बहती मस्त बयार है ।
महामारी तो है यह फिर भी , प्रदूषण मुक्त्त बहार है ।।

बन्द पड़े उद्योग ये धन्धे , बन्द सभी धूम-स्रोत है ।
शान्त पयोधि ता ऊपर चलता , जैसे कोई युद्धपोत है ।।
वायु का मण्डल शुद्ध हुआ , भय अंतः मन गुलजार है ।
महामारी तो है यह फिर भी , प्रदूषण मुक्त्त बहार है ।।

स्वच्छंद वातावरण मय धरती , स्वस्थ ये जीवन काया है ।
सत्कर्मों को मान अगर जो , मनु तन जीवन पाया है ।।
इस पर कुछ आधारित है , और इसका कुछ आधार है ।
महामारी तो है यह फिर भी , प्रदूषण मुक्त्त बहार है ।।

नदियाँ स्वच्छ हुई निर्मल जल , नीर जीव सब चहक उठे ।
स्वच्छ गगन तल चील-चिलैया , नीड़ से अपने बहक उठे ।।
आपदा से जकड़ा विश्व यह , उनको क्या ऐतवार है ।
महामारी तो है यह फिर भी , प्रदूषण मुक्त्त बहार है ।।

निज कर को जन धोने से , पहले क्यों परहेज करें ।
अब मल-मल धोयें कई बार , रखते सब सहेज करें ।।
स्वच्छता गर प्रसरित हुई , तो स्वस्थता बारम्बार है ।
महामारी तो है यह फिर भी , प्रदूषण मुक्त्त बहार है ।।

बच्चों को छुट्टी के दिन का , तन-मन से कितना नेह रहा ।
अब केवल छुट्टी ही छुट्टी , आमोद-प्रमोद निज गेह रहा ।।
अफसर शिक्षक सबको छुट्टी , कहाँ कही कोई कार है ।
महामारी तो है यह फिर भी , प्रदूषण मुक्त्त बहार है ।।

प्रवासी निज गेह पहुँचने , को अब कितने आतुर है ।
ज्ञात उन्हें क्या अब भी नही , यह कितना वृहत्तम नासूर है ।।
फूंक के कदम बढ़ाएं जन-जन , ‘मणि’ का यह उच्च विचार है ।
महामारी तो है यह फिर भी , प्रदूषण मुक्त्त बहार है ।।

रघुबंशमणि दूबे

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